श्री पहलवान नंजप्पा – चित्रदुर्ग के कुश्ती जगत का ध्रुवतारा

चित्रदुर्ग का नाम आते ही उसका विशाल किला, चंद्रवल्ली, जोगिमट्टी और वीरतापूर्ण इतिहास याद आता है। लेकिन चित्रदुर्ग की सांस्कृतिक पहचान का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा है — यहाँ की प्राचीन गरड़ी अर्थात पारंपरिक अखाड़ों और कुश्ती की परंपरा।
इसी गौरवशाली परंपरा से निकले महान पहलवानों में पहलवान नंजप्पा का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है।
वे केवल एक शक्तिशाली पहलवान ही नहीं थे, बल्कि कुश्ती गुरु, देशभक्त, स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने वाले साहसी व्यक्ति, तबला प्रेमी और कला-संस्कृति से जुड़े बहुमुखी व्यक्तित्व भी थे।
चित्रदुर्ग की कुश्ती परंपरा
“वीरों की भूमि” के रूप में प्रसिद्ध चित्रदुर्ग में शारीरिक शक्ति, युद्धकला और कुश्ती की परंपरा सदियों पुरानी है।
विजयनगर काल से इस क्षेत्र में मल्लयुद्ध और शारीरिक प्रशिक्षण की परंपरा विकसित हुई। बाद में चित्रदुर्ग के नायकों के शासनकाल में भी यह जारी रही।
मल्लयुद्ध में निपुण जट्टी समुदाय के लोग शासकों और योद्धाओं को कुश्ती तथा शारीरिक युद्धकला का प्रशिक्षण देते थे।
चित्रदुर्ग के प्रसिद्ध पारंपरिक अखाड़ों में डोड्डा गरड़ी, सन्ना गरड़ी, बुरुजनहट्टी गरड़ी, हगलु दीवटिगे गरड़ी, आंजनेय स्वामी गरड़ी और होरपेटे की अंजुमन गरड़ी शामिल थीं।
इसी समृद्ध परंपरा से पहलवान नंजप्पा का उदय हुआ।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
पहलवान नंजप्पा का जन्म 9 अगस्त 1924 को लाडरा ईश्वरप्पा और नंजम्मा के तीसरे पुत्र के रूप में हुआ।
वे लाडर समुदाय से संबंधित थे, जिसकी जड़ें उत्तर भारत से जुड़ी मानी जाती हैं।
बचपन से ही नंजप्पा को कुश्ती के प्रति असाधारण आकर्षण था। औपचारिक पढ़ाई की तुलना में अखाड़े की मिट्टी और शारीरिक प्रशिक्षण उन्हें अधिक आकर्षित करते थे।
अखाड़ा ही उनकी पाठशाला बना और कुश्ती उनके जीवन की पहचान।
डोड्डा गरड़ी के पहलवान
नंजप्पा का जीवन चित्रदुर्ग की प्रसिद्ध डोड्डा गरड़ी से गहराई से जुड़ा था। आगे चलकर वे इसके उस्ताद भी बने।
उन्होंने प्रारंभ में बुड्डन्ना से कुश्ती की बारीकियाँ सीखीं। इसके बाद लाहौर से आए प्रसिद्ध उस्ताद परिपैगर ने उनकी प्रतिभा को निखारा।
इस गुरु-शिष्य संबंध का महत्व खेल से भी आगे था। हिंदू शिष्य और मुस्लिम गुरु का यह आत्मीय संबंध हिंदू-मुस्लिम सद्भाव और आपसी सम्मान का सुंदर उदाहरण बन गया।
कुश्ती जगत का सितारा
नंजप्पा की शारीरिक शक्ति, साहस, कुश्ती के दाँव-पेंच और प्रभावशाली व्यक्तित्व ने उन्हें अत्यंत लोकप्रिय बना दिया।
उस दौर में पहलवान केवल खिलाड़ी नहीं होता था। वह अपने अखाड़े, गुरु और नगर के सम्मान का प्रतिनिधि होता था।
नंजप्पा चित्रदुर्ग के लिए ऐसे ही गौरव का प्रतीक बने।
उनके प्रसिद्ध शिष्यों में गौळिगरा लिंगन्ना, जिन्हें मूगा के नाम से जाना जाता था, उल्लेखनीय थे।
देशभक्त नंजप्पा
नंजप्पा का साहस केवल अखाड़े तक सीमित नहीं था।
1947 में भारत की स्वतंत्रता के आसपास मैसूर राज्य में चले “मैसूर चलो” आंदोलन का प्रभाव चित्रदुर्ग में भी दिखाई दिया।
नंजप्पा और डोड्डा गरड़ी के सदस्यों ने आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया।
नंजप्पा ने एक सरकारी कार्यालय पर भारतीय तिरंगा फहराने के साहसिक कार्य में भाग लिया। इस दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज और गोलीबारी की। कहा जाता है कि नंजप्पा पुलिस की गोली से बाल-बाल बच गए।
यह घटना उनकी देशभक्ति और निर्भीकता का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
तबला और रंगमंच से प्रेम
विशाल शरीर और पहलवानी व्यक्तित्व के पीछे नंजप्पा का एक संवेदनशील कलाकार भी छिपा था।
उन्हें तबला बजाने का विशेष शौक था।
वे कई नाटक कंपनियों के संपर्क में रहे और शौकिया तबला वादक के रूप में भी अपनी पहचान बनाई। उनके वादन को हिरण्णय्या जैसे रंगमंच के प्रतिष्ठित कलाकारों की प्रशंसा भी मिली।
चित्रदुर्ग के तत्कालीन सांस्कृतिक जीवन और नव भारत तरुण कलाकार संघ जैसी संस्थाओं से भी उनका संबंध रहा।
“राजा वीर मदकरी नायक” जैसे ऐतिहासिक नाटक उस दौर में चित्रदुर्ग के इतिहास और गौरव को रंगमंच के माध्यम से जीवित रखते थे।
डॉ. राजकुमार और सिनेमा
नाटक कंपनियों के साथ संपर्क के कारण नंजप्पा का परिचय कन्नड़ सिनेमा के कलाकारों से भी हुआ।
कन्नड़ फिल्मों के महान अभिनेता डॉ. राजकुमार से भी उनका परिचय और मैत्रीपूर्ण संबंध रहा।
नंजप्पा ने डॉ. राजकुमार अभिनीत ऐतिहासिक फिल्म “रणधीर कंठीरव” में अतिथि कलाकार के रूप में अभिनय किया और वास्तविक जीवन की तरह पर्दे पर भी एक पहलवान की भूमिका निभाई।
एक बहुमुखी व्यक्तित्व
नंजप्पा को केवल एक पहलवान के रूप में देखना उनके व्यक्तित्व को सीमित कर देना होगा।
वे पहलवान, उस्ताद, देशभक्त, आंदोलनकारी, तबला वादक, रंगमंच प्रेमी और कला-संस्कृति से जुड़े व्यक्ति थे।
उनका जीवन पुराने चित्रदुर्ग के अखाड़ों, स्वतंत्रता आंदोलन, नाटक, संगीत और सिनेमा की दुनिया को आपस में जोड़ता है।
दुखद अंत
इतनी प्रतिभा और लोकप्रियता के बावजूद नंजप्पा के जीवन का अंतिम अध्याय दुखद रहा।
बाद के वर्षों में वे शराब की लत से प्रभावित हुए। इसका उनके स्वास्थ्य और जीवन पर गंभीर प्रभाव पड़ा।
केवल लगभग 41 वर्ष की आयु में, 1965 में, पहलवान नंजप्पा का निधन हो गया।
उनकी मृत्यु से जुड़ी एक मार्मिक स्मृति उनके प्रिय कुत्ते की है। नंजप्पा की मृत्यु के कुछ ही दिनों बाद उनका वफादार कुत्ता भी उनके समाधि स्थल के पास मर गया बताया जाता है।
यह कहानी मालिक और पशु के बीच प्रेम तथा निष्ठा की भावुक याद बन गई।
स्मारक और विरासत
चित्रदुर्ग ने अपने इस महान पहलवान की स्मृति को जीवित रखा है।
कुश्ती के क्षेत्र में उनके योगदान की स्मृति में कामन बागिलु के सामने, महारानी कॉलेज के पास उनका स्मारक स्थापित किया गया।
डोड्डा गरड़ी में नूला हुन्निमे के उत्सव के दौरान नंजप्पा का विशाल चित्र जुलूस में ले जाने की परंपरा भी उनके प्रति सम्मान को दर्शाती है।
लेखक टी. आर. राधाकृष्ण ने उनके जीवन और चित्रदुर्ग की कुश्ती संस्कृति को “कुस्ती लोकदा ध्रुवतारे पहलवान नंजप्पा” नामक कृति में दर्ज किया है।
यह केवल एक पहलवान की कहानी नहीं, बल्कि चित्रदुर्ग की गरड़ी संस्कृति, गुरु-शिष्य परंपरा, कुश्ती, रंगमंच, संगीत और उस समय के सामाजिक जीवन की स्मृति भी है।
चित्रदुर्ग का गौरव
नंजप्पा के दौर में कुश्ती केवल एक खेल नहीं थी। वह शक्ति, अनुशासन, साहस, सम्मान और नगर के गौरव का प्रतीक थी।
अखाड़े में साहस दिखाने वाला पहलवान, तिरंगे के लिए गोलियों से न डरने वाला देशभक्त, तबले में लय खोजने वाला कलाकार और रंगमंच से प्रेम करने वाला कला-प्रेमी — ये सभी पहलवान नंजप्पा के व्यक्तित्व के अलग-अलग रूप थे।
निष्कर्ष
पहलवान नंजप्पा चित्रदुर्ग के कुश्ती इतिहास के अविस्मरणीय ध्रुवतारा हैं।
उनके जीवन में विजय थी, संघर्ष था, देशप्रेम था, कला थी और अंत में त्रासदी भी थी। लेकिन समय उनके नाम और योगदान को मिटा नहीं सका।
आज नंजप्पा को याद करना केवल एक महान पहलवान को याद करना नहीं है। यह चित्रदुर्ग की गरड़ी परंपरा, मल्लयुद्ध संस्कृति और वीरता की विरासत को याद करना है।
पहलवान नंजप्पा केवल चित्रदुर्ग के एक पहलवान नहीं थे — वे इस वीरभूमि की शक्ति, साहस, देशभक्ति और कुश्ती परंपरा के प्रतीक बन गए।
