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श्रीमती सिरियज्जी – चित्रदुर्ग की लोक संस्कृति का चलता-फिरता विश्वकोश

कर्नाटक के लोक साहित्य में श्रीमती सिरियज्जी का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। औपचारिक शिक्षा और अक्षरज्ञान से वंचित होने के बावजूद उन्होंने हजारों लोकगीतों, लोकपदों और कथाओं को अपनी असाधारण स्मरणशक्ति में सुरक्षित रखा। इसी कारण वे “जनपद सिरी”, “जनपद कोकिला”, “जनपद कणज” और लोक संस्कृति के चलते-फिरते विश्वकोश के रूप में प्रसिद्ध हुईं।

लेखक राघवेंद्र पद्मशालीप्रकाशित 20 अक्टूबर 20264 मिनट का पाठ4 बार देखा गया
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श्रीमती सिरियज्जी – चित्रदुर्ग की लोक संस्कृति का चलता-फिरता विश्वकोश

कर्नाटक के लोक साहित्य में श्रीमती सिरियज्जी का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। औपचारिक शिक्षा और अक्षरज्ञान से वंचित होने के बावजूद उन्होंने हजारों लोकगीतों, लोकपदों और कथाओं को अपनी असाधारण स्मरणशक्ति में सुरक्षित रखा।

इसी कारण वे “जनपद सिरी”, “जनपद कोकिला”, “जनपद कणज” और लोक संस्कृति के चलते-फिरते विश्वकोश के रूप में प्रसिद्ध हुईं।

प्रारंभिक जीवन

सिरियज्जी का जन्म चित्रदुर्ग जिले के चल्लकेरे तालुक स्थित यलगट्टे गोल्लरहट्टी में ईरप्पा और काडम्मा के परिवार में हुआ।

वे काडुगोल्ल समुदाय से संबंधित थीं।

उन्हें विद्यालय में औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने का अवसर नहीं मिला। लेकिन उनकी माँ और दादी से प्राप्त मौखिक शिक्षा किसी विश्वविद्यालय से कम नहीं थी।

खेती करते समय, अनाज कूटते हुए, घरेलू काम करते हुए, विवाह समारोहों और त्योहारों में उनकी माँ और दादी जो गीत गाती थीं, बालिका सिरियज्जी उन्हें ध्यान से सुनती थीं।

उन गीतों को उन्होंने अपनी स्मृति में हमेशा के लिए संजो लिया।

काडुगोल्ल संस्कृति की आवाज

काडुगोल्ल समुदाय की अपनी विशिष्ट परंपराएँ, धार्मिक विश्वास, देवी-देवता, उत्सव और मौखिक साहित्य हैं।

इस संस्कृति में गीत केवल मनोरंजन नहीं था।

विवाह का गीत था, त्योहार का गीत था, खेती का गीत था, देवी-देवताओं का गीत था; सुख और दुःख दोनों के लिए गीत थे।

सिरियज्जी इसी जीवंत मौखिक परंपरा की सबसे महत्वपूर्ण प्रतिनिधियों में से एक बनीं।

हजारों गीतों की स्वामिनी

सिरियज्जी की सबसे बड़ी विशेषता उनकी अद्भुत स्मरणशक्ति थी।

वे बिना किसी पुस्तक या लिखित सामग्री की सहायता के हजारों लोकगीत और लंबे कथात्मक पद सुना सकती थीं। लोकप्रिय विवरणों में उनके लोक-संग्रह को लगभग दस हजार पदों और गीतों का भंडार तक कहा गया है।

“महासती काटव्वा” और “कत्तले दारी दूर” जैसे कथात्मक गीत विशेष रूप से प्रसिद्ध हुए।

उनकी स्मृति अपने आप में एक जीवित पुस्तकालय थी।

बेलगेरे कृष्णशास्त्री का प्रोत्साहन

सिरियज्जी की प्रतिभा को व्यापक समाज तक पहुँचाने में साहित्यकार और सांस्कृतिक व्यक्तित्व बेलगेरे कृष्णशास्त्री का प्रोत्साहन महत्वपूर्ण रहा।

उनके प्रयासों और अन्य विद्वानों की रुचि से गाँव और समुदाय के भीतर मौखिक रूप में जीवित सिरियज्जी का विशाल लोक-साहित्य साहित्यकारों तथा शोधकर्ताओं तक पहुँचा।

धीरे-धीरे वे केवल अपने गाँव की गायिका न रहकर कर्नाटक की मौखिक साहित्य परंपरा की महत्वपूर्ण प्रतिनिधि बन गईं।

गीतों में आम लोगों का इतिहास

सिरियज्जी के गीतों में ग्रामीण जीवन की वास्तविक तस्वीर दिखाई देती थी।

विवाह, पारिवारिक संबंध, महिलाओं का जीवन, कृषि, त्योहार, स्थानीय देवता, सुख-दुःख, आस्था और सामाजिक परंपराएँ उनके गीतों में जीवित थीं।

राजाओं और युद्धों का इतिहास पुस्तकों में मिलता है, लेकिन सिरियज्जी के गीतों में सामान्य लोगों के जीवन का इतिहास सुरक्षित था।

इसीलिए उन्हें केवल लोक गायिका कहना पर्याप्त नहीं है।

वे एक पूरे समुदाय की सामूहिक स्मृति की संरक्षिका थीं।

सम्मान और पुरस्कार

सिरियज्जी के योगदान को अनेक संस्थाओं ने सम्मानित किया।

कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री आर. गुंडूराव ने उन्हें “जनपद सिरी” की उपाधि से सम्मानित किया।

कन्नड़ विश्वविद्यालय, हम्पी ने उन्हें प्रतिष्ठित “नाडोजा” सम्मान प्रदान किया।

कर्नाटक जनपद अकादमी तथा अनेक साहित्यिक, सांस्कृतिक और लोक संस्थाओं ने भी उनके योगदान को सम्मानित किया।

लेकिन आम लोगों द्वारा प्रेम से दिया गया नाम “सिरियज्जी” शायद उनके लिए सबसे आत्मीय सम्मान था।

अगली पीढ़ी तक पहुँची परंपरा

सिरियज्जी की परंपरा उनके साथ समाप्त नहीं हुई।

यलगट्टे क्षेत्र की लोक गायिका सिरियम्मा, जिन्होंने सिरियज्जी के साथ अनेक कार्यक्रमों में गीत गाए, इस परंपरा को आगे बढ़ाने वाली महत्वपूर्ण कलाकारों में शामिल हैं।

सिरियम्मा ने सोबाने, कोलु, गग्गरा जैसे गीतों के साथ एत्तप्पा, जुंजप्पा और क्यातप्पा जैसे काडुगोल्ल सांस्कृतिक नायकों से संबंधित महाकाव्यात्मक गीतों को आगे बढ़ाया और युवा महिलाओं को सिखाने का प्रयास किया।

यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि नाडोजा सिरियज्जी और लोक गायिका सिरियम्मा दो अलग-अलग व्यक्तित्व हैं, लेकिन दोनों को जोड़ने वाली कड़ी काडुगोल्ल समुदाय की समृद्ध मौखिक परंपरा है।

अंतिम समय

सिरियज्जी का अप्रैल 2009 में यलगट्टे गोल्लरहट्टी में निधन हो गया।

उनकी मृत्यु के साथ एक महान आवाज मौन हुई, लेकिन उस आवाज में सुरक्षित संस्कृति समाप्त नहीं हुई।

उनके गीतों को सुनने वाले लोग, उन्हें दर्ज करने वाले शोधकर्ता और अगली पीढ़ी तक लोकगीत पहुँचाने वाले कलाकार आज भी उनकी विरासत को जीवित रखते हैं।

चित्रदुर्ग की असली ‘जनपद सिरी’

चित्रदुर्ग ने अनेक योद्धा, शासक, संत, लेखक और कलाकार दिए हैं। इनमें सिरियज्जी का स्थान बिल्कुल अलग और अत्यंत महत्वपूर्ण है।

उन्होंने कोई किला नहीं बनाया।

उन्होंने पुस्तकें नहीं लिखीं।

उन्होंने विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त नहीं की।

फिर भी उन्होंने पीढ़ियों से चली आ रही एक पूरे समुदाय की सांस्कृतिक स्मृति को अपनी आवाज और स्मरणशक्ति में सुरक्षित रखा।

उनके गीतों में लोगों का जीवन था।

उनके शब्दों में काडुगोल्ल संस्कृति थी।

उनकी आवाज में चित्रदुर्ग की मिट्टी की सुगंध थी।

निष्कर्ष

श्रीमती सिरियज्जी केवल एक लोक गायिका नहीं थीं; वे कर्नाटक की मौखिक साहित्य परंपरा का जीवित पुस्तकालय थीं।

एक ऐसी ग्रामीण महिला, जो पढ़ना-लिखना नहीं जानती थीं, हजारों लोकगीतों को स्मृति में सुरक्षित रखकर विद्वानों, लेखकों और शोधकर्ताओं के लिए ज्ञान का स्रोत बन गईं।

उनका जीवन हमें याद दिलाता है कि साहित्य केवल पुस्तकों में नहीं होता।

कभी-कभी साहित्य स्मृति में जीवित रहता है।
कभी-कभी इतिहास गीत बनकर बहता है।
और कभी-कभी एक पूरे समाज की संस्कृति एक दादी की आवाज में सुरक्षित रहती है।

चित्रदुर्ग के लिए वह अमूल्य आवाज थीं — नाडोजा सिरियज्जी, हमारी सच्ची “जनपद सिरी”।

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लेखक के बारे में

राघवेंद्र पद्मशाली · प्रशासक / मुख्य संपादक

चितारदुर्गा के संस्थापक, एडमिन और मुख्य संपादक संपर्क: +91 77979 73031, +91 97432 08738 वेबसाइट: www.raghavendrapadmashali.com

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