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श्री एस. निजलिंगप्पा – एकीकृत कर्नाटक के शिल्पकार

श्री सिद्धवनहल्ली निजलिंगप्पा स्वतंत्रता सेनानी, अधिवक्ता, राजनेता और कर्नाटक के राजनीतिक इतिहास की प्रमुख हस्तियों में से एक थे। उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम, कन्नड़ भाषी क्षेत्रों के एकीकरण, एकीकृत मैसूर राज्य के निर्माण तथा स्वतंत्रता के बाद कर्नाटक के राजनीतिक और प्रशासनिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

लेखक राघवेंद्र पद्मशालीप्रकाशित 19 अक्टूबर 20266 मिनट का पाठ4 बार देखा गया
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श्री एस. निजलिंगप्पा – एकीकृत कर्नाटक के शिल्पकार

श्री एस. निजलिंगप्पा – एकीकृत कर्नाटक के शिल्पकार

श्री सिद्धवनहल्ली निजलिंगप्पा (10 दिसंबर 1902 – 8 अगस्त 2000) स्वतंत्रता सेनानी, अधिवक्ता, राजनेता और कर्नाटक के राजनीतिक इतिहास की प्रमुख हस्तियों में से एक थे। उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम, कन्नड़ भाषी क्षेत्रों के एकीकरण, एकीकृत मैसूर राज्य के निर्माण तथा स्वतंत्रता के बाद कर्नाटक के राजनीतिक और प्रशासनिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

वे भारत की संविधान सभा के सदस्य भी रहे और बाद में मैसूर राज्य के मुख्यमंत्री तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

एस. निजलिंगप्पा का जन्म 10 दिसंबर 1902 को हलुवागलु, तत्कालीन बेल्लारी जिले में हुआ था। उन्होंने बेंगलुरु में उच्च शिक्षा प्राप्त की और बाद में पुणे में कानून की पढ़ाई की। कानूनी शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने 1926 में अधिवक्ता के रूप में अपना पेशेवर जीवन शुरू किया।

उनका युवावस्था का समय भारत में बढ़ते राष्ट्रीय आंदोलन से प्रभावित था। एनी बेसेंट के लेखन ने उनकी राजनीतिक चेतना को प्रभावित किया, जबकि महात्मा गांधी तथा अन्य राष्ट्रीय नेताओं के विचारों ने उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए प्रेरित किया।

स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका

निजलिंगप्पा का सार्वजनिक जीवन भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से गहराई से जुड़ा हुआ था। उन्होंने ब्रिटिश शासन और तत्कालीन रियासती व्यवस्थाओं के विरुद्ध विभिन्न आंदोलनों में भाग लिया तथा कई बार कारावास भी झेला।

1939 के वन सत्याग्रह के दौरान उन्होंने तुरुवनूर में हुए आंदोलन में भाग लिया। उन्हें गिरफ्तार कर जेल की सजा दी गई। रिहाई के बाद भी वे राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय रहे और भारत छोड़ो आंदोलन के दौर में भी उनकी राजनीतिक गतिविधियां जारी रहीं।

उनका राजनीतिक जीवन केवल चुनाव और सत्ता तक सीमित नहीं था; उसकी नींव स्वतंत्रता आंदोलन के आदर्शों और अनुभवों पर रखी गई थी।

संविधान सभा के सदस्य

स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था के निर्माण की ऐतिहासिक प्रक्रिया में भी निजलिंगप्पा ने भूमिका निभाई।

वे 1946 से 1950 तक भारत की संविधान सभा के सदस्य रहे। इस प्रकार वे उस ऐतिहासिक पीढ़ी का हिस्सा बने जिसने औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्र संवैधानिक गणराज्य की ओर भारत के परिवर्तन को देखा और उसमें भाग लिया।

बाद में उन्होंने संसद में भी सेवा की और लोकसभा में चित्रदुर्ग का प्रतिनिधित्व किया।

कर्नाटक एकीकरण आंदोलन के प्रमुख नेता

श्री एस. निजलिंगप्पा के सार्वजनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण अध्याय कर्नाटक एकीकरण आंदोलन से जुड़ा था।

स्वतंत्रता से पहले कन्नड़ भाषी क्षेत्र अलग-अलग प्रशासनिक इकाइयों—मैसूर रियासत, बॉम्बे प्रांत, मद्रास प्रांत और हैदराबाद राज्य—में विभाजित थे। इन कन्नड़ भाषी क्षेत्रों को एक राज्य के अंतर्गत लाने के उद्देश्य से कर्नाटक एकीकरण आंदोलन आगे बढ़ा।

राज्यों के भाषाई पुनर्गठन के बाद 1 नवंबर 1956 को विभिन्न कन्नड़ भाषी क्षेत्रों को मिलाकर विस्तृत मैसूर राज्य बनाया गया। बाद में 1973 में इसका नाम बदलकर कर्नाटक कर दिया गया।

निजलिंगप्पा इस ऐतिहासिक परिवर्तन से जुड़े प्रमुख राजनीतिक नेताओं में थे और 1 नवंबर 1956 को एकीकृत मैसूर राज्य के मुख्यमंत्री बने।

इस कारण आधुनिक कर्नाटक के राजनीतिक और प्रशासनिक एकीकरण के इतिहास में उनका विशेष स्थान है।

मैसूर राज्य के मुख्यमंत्री

श्री एस. निजलिंगप्पा ने दो प्रमुख अवधियों में मैसूर राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया:

  • 1 नवंबर 1956 – 16 मई 1958

  • 21 जून 1962 – मई 1968

उनका कार्यकाल नवगठित राज्य के विकास का महत्वपूर्ण दौर था।

उनकी सरकार ने कृषि, सिंचाई, बिजली, उद्योग, परिवहन और बुनियादी ढांचे के विकास पर ध्यान दिया।

कर्नाटक के विद्युत विकास में महत्वपूर्ण शरावती जलविद्युत परियोजना उनके शासनकाल से जुड़े प्रमुख विकास कार्यों में से एक थी।

कृषि और सिंचाई के विकास के साथ कृषि शिक्षा को बढ़ावा देने के प्रयास भी किए गए। बेंगलुरु स्थित कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय के विकास में भी उनके शासनकाल की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

तिब्बती शरणार्थियों को सहयोग

निजलिंगप्पा के शासनकाल का एक उल्लेखनीय अध्याय तिब्बती शरणार्थियों के पुनर्वास के लिए कर्नाटक द्वारा दिया गया सहयोग था।

तिब्बत से भारत आए शरणार्थियों के पुनर्वास के लिए उनकी सरकार ने कर्नाटक में भूमि और अन्य आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराया। इसके परिणामस्वरूप कर्नाटक भारत में तिब्बती समुदाय के महत्वपूर्ण केंद्रों में से एक बना।

इस ऐतिहासिक संबंध को कई दशक बाद भी याद किया गया। जनवरी 2011 में दलाई लामा ने चित्रदुर्ग के निकट एस. निजलिंगप्पा स्मारक का उद्घाटन किया।

कर्नाटक से राष्ट्रीय राजनीति तक

निजलिंगप्पा का राजनीतिक प्रभाव केवल कर्नाटक तक सीमित नहीं रहा।

मुख्यमंत्री के रूप में कार्य करने के बाद उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और 1968 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष बने।

उनका अध्यक्षीय कार्यकाल कांग्रेस पार्टी के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण और राजनीतिक रूप से जटिल दौरों में से एक था।

1969 में कांग्रेस संगठन के नेतृत्व और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बीच गंभीर मतभेदों के कारण पार्टी का ऐतिहासिक विभाजन हुआ। उस समय निजलिंगप्पा कांग्रेस के संगठनात्मक पक्ष के प्रमुख नेताओं में शामिल थे।

इस दौर की राजनीतिक घटनाओं की अलग-अलग ऐतिहासिक व्याख्याएं हैं, लेकिन इन घटनाओं के केंद्र में उनकी उपस्थिति राष्ट्रीय राजनीति में उनके महत्व को दर्शाती है।

चित्रदुर्ग से गहरा संबंध

श्री एस. निजलिंगप्पा का चित्रदुर्ग से विशेष संबंध था।

उन्होंने अपनी शिक्षा का एक हिस्सा चित्रदुर्ग में प्राप्त किया, क्षेत्र के सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन में सक्रिय रहे और बाद में लोकसभा में चित्रदुर्ग का प्रतिनिधित्व किया।

राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर उच्च पदों पर कार्य करने के बाद भी चित्रदुर्ग से उनका संबंध बना रहा। सक्रिय राजनीति से दूर होने के बाद उन्होंने अपने जीवन के अंतिम वर्ष चित्रदुर्ग में बिताए।

इसलिए वे केवल कर्नाटक के नेता ही नहीं, बल्कि चित्रदुर्ग के आधुनिक इतिहास की भी एक महत्वपूर्ण हस्ती हैं।

सादगी और सार्वजनिक जीवन

अपने लंबे राजनीतिक जीवन के साथ निजलिंगप्पा को सादगी, अनुशासन और सार्वजनिक जीवन के मूल्यों के लिए भी याद किया जाता है।

स्वतंत्रता आंदोलन से शुरू हुई उनकी सार्वजनिक यात्रा स्वतंत्र भारत के निर्माण, संविधान सभा, कर्नाटक के एकीकरण, राज्य प्रशासन और राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंची।

उनकी आत्मकथा My Life and Politics उनके राजनीतिक अनुभवों और बीसवीं सदी के भारतीय राजनीतिक इतिहास को समझने का एक महत्वपूर्ण स्रोत है।

अंतिम वर्ष और विरासत

श्री एस. निजलिंगप्पा का 8 अगस्त 2000 को चित्रदुर्ग में निधन हुआ। वे 97 वर्ष के थे।

उनका जीवन औपनिवेशिक भारत से लेकर स्वतंत्रता आंदोलन, स्वतंत्र भारत की स्थापना, संविधान निर्माण, कर्नाटक के एकीकरण और लोकतांत्रिक शासन के विकास तक फैले महत्वपूर्ण ऐतिहासिक काल का साक्षी रहा।

आज उन्हें विशेष रूप से स्वतंत्रता संग्राम, कर्नाटक के एकीकरण, एकीकृत राज्य के प्रशासन एवं विकास और राष्ट्रीय राजनीतिक जीवन में योगदान के लिए याद किया जाता है।

आधुनिक कर्नाटक के निर्माण से जुड़ा जीवन

श्री एस. निजलिंगप्पा उस पीढ़ी के नेता थे जिसने न केवल देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया, बल्कि स्वतंत्रता के बाद नए राष्ट्र और राज्य की संस्थाओं के निर्माण की जिम्मेदारी भी निभाई।

चित्रदुर्ग के लिए उनकी कहानी का विशेष महत्व है। चित्रदुर्ग से निकट संबंध रखने वाले एक नेता ने आगे चलकर भारत की संविधान सभा में भाग लिया, एकीकृत मैसूर राज्य का नेतृत्व किया और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सर्वोच्च संगठनात्मक पदों में से एक तक पहुंचे।

इस प्रकार श्री एस. निजलिंगप्पा का जीवन चित्रदुर्ग, कर्नाटक और आधुनिक भारत के इतिहास का एक अभिन्न अध्याय है।

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लेखक के बारे में

राघवेंद्र पद्मशाली · प्रशासक / मुख्य संपादक

चितारदुर्गा के संस्थापक, एडमिन और मुख्य संपादक संपर्क: +91 77979 73031, +91 97432 08738 वेबसाइट: www.raghavendrapadmashali.com

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