ब्रिटिश काल में चित्रदुर्ग का प्रशासन

ब्रिटिश काल में चित्रदुर्ग का प्रशासन
ब्रिटिश काल ने चित्रदुर्ग की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए। अठारहवीं शताब्दी में चित्रदुर्ग के नायक शासकों का शासन समाप्त होने के बाद यह क्षेत्र हैदर अली और टीपू सुल्तान के अधीन मैसूर राज्य का हिस्सा बना। 1799 के चौथे आंग्ल-मैसूर युद्ध के बाद मैसूर की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था में बड़े बदलाव आए।
ब्रिटिश काल में चित्रदुर्ग के प्रशासन को मुख्य रूप से दो चरणों में समझा जा सकता है — 1831 से 1881 तक मैसूर का प्रत्यक्ष ब्रिटिश प्रशासन और 1881 के बाद ब्रिटिश सर्वोच्चता के अधीन पुनर्स्थापित मैसूर रियासत का प्रशासन।
नायक शासकों से मैसूर शासन तक
चित्रदुर्ग के नायक शासकों का स्वतंत्र शासन 1779 में समाप्त हुआ, जब हैदर अली ने चित्रदुर्ग पर अधिकार कर लिया। इसके बाद यह क्षेत्र मैसूर राज्य का हिस्सा बन गया और पहले हैदर अली तथा बाद में टीपू सुल्तान के शासन में रहा।
1799 के चौथे आंग्ल-मैसूर युद्ध में टीपू सुल्तान की पराजय और मृत्यु के बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने मैसूर में वोडेयार राजवंश को पुनः स्थापित किया। इसके साथ चित्रदुर्ग पुनर्गठित मैसूर राज्य का हिस्सा बन गया।
यद्यपि मैसूर में अपना शासक था, फिर भी राज्य की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था पर ब्रिटिश प्रभाव काफी बढ़ गया था।
प्रत्यक्ष ब्रिटिश प्रशासन
1831 में प्रशासनिक समस्याओं का हवाला देते हुए अंग्रेजों ने मैसूर राज्य का प्रशासन सीधे अपने नियंत्रण में ले लिया। 1881 तक मैसूर का शासन ब्रिटिश कमिश्नरों के माध्यम से संचालित किया गया।
इस अवधि में चित्रदुर्ग अधिक केंद्रीकृत प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा बन गया। राजस्व संग्रह, पुलिस व्यवस्था, न्यायिक प्रशासन, अभिलेखों के रखरखाव और जिला प्रशासन में अधिक व्यवस्थित पद्धतियाँ अपनाई गईं।
राजस्व, कानून-व्यवस्था तथा सरकारी नीतियों के क्रियान्वयन के लिए अधिकारियों पर आधारित प्रशासनिक ढाँचा अधिक संगठित हुआ। तालुक और गाँव स्थानीय प्रशासन की महत्वपूर्ण इकाइयाँ बने रहे।
भूमि-राजस्व सरकार की आय का प्रमुख स्रोत था। इसलिए कृषि भूमि के सर्वेक्षण, मूल्यांकन और राजस्व अभिलेखों के रखरखाव को विशेष महत्व दिया गया।
जिला और तालुक प्रशासन
मैसूर राज्य में विकसित प्रशासनिक व्यवस्था के अंतर्गत चित्रदुर्ग एक महत्वपूर्ण जिला केंद्र के रूप में उभरा।
जिला प्रशासन राजस्व संग्रह, कानून और व्यवस्था, न्यायिक कार्यों तथा सरकारी नियमों के क्रियान्वयन का समन्वय करता था।
जिले के नीचे तालुक महत्वपूर्ण प्रशासनिक इकाइयाँ थीं। तालुक स्तर के अधिकारी राजस्व संग्रह सहित विभिन्न सरकारी कार्यों का संचालन करते थे।
ग्राम स्तर पर परंपरागत स्थानीय अधिकारी अपनी भूमिका निभाते रहे, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें अधिक संगठित और केंद्रीकृत प्रशासनिक व्यवस्था में शामिल किया गया।
इस प्रकार पुरानी स्थानीय प्रशासनिक परंपराओं और नई नौकरशाही व्यवस्था के मेल से जिले की आधुनिक प्रशासनिक प्रणाली विकसित होने लगी।
राजस्व और कृषि
उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में चित्रदुर्ग की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि था। इसलिए भूमि-राजस्व प्रशासन सरकार की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में से एक था।
कृषि भूमि का सर्वेक्षण और वर्गीकरण किया जाता था तथा उसके आधार पर कर निर्धारित किया जाता था। भूमि स्वामित्व, खेती और किसानों द्वारा दिए जाने वाले राजस्व से संबंधित अभिलेख अधिक व्यवस्थित रूप से रखे जाने लगे।
चित्रदुर्ग मुख्यतः शुष्क कृषि क्षेत्र था और अक्सर सूखे की समस्या का सामना करता था। इसलिए वर्षा में उतार-चढ़ाव का कृषि उत्पादन और ग्रामीण जीवन पर सीधा प्रभाव पड़ता था।
सूखा और खाद्यान्न की कमी प्रशासन के लिए गंभीर चुनौतियाँ थीं।
सड़कें, सिंचाई और सार्वजनिक निर्माण
ब्रिटिश प्रशासन के दौर में सार्वजनिक आधारभूत संरचना में भी धीरे-धीरे सुधार हुआ।
चित्रदुर्ग को अन्य महत्वपूर्ण नगरों से जोड़ने वाली सड़कों का निर्माण और सुधार किया गया। इससे प्रशासन, व्यापार और लोगों की आवाजाही को सुविधा मिली।
सार्वजनिक निर्माण के अंतर्गत सड़कों, सरकारी भवनों, तालाबों और सिंचाई सुविधाओं के निर्माण तथा रखरखाव पर ध्यान दिया गया।
बाद के मैसूर रियासत के शासन में सिंचाई और जल प्रबंधन को और अधिक महत्व मिला। हिरियूर के निकट वेदावती नदी पर निर्मित वाणी विलास सागर जिले की महत्वपूर्ण सिंचाई परियोजनाओं में से एक बना।
पुलिस और न्यायिक प्रशासन
उन्नीसवीं शताब्दी में पुलिस और न्यायिक व्यवस्था में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए।
कानून-व्यवस्था बनाए रखने और विवादों के समाधान के लिए केवल पुरानी स्थानीय व्यवस्थाओं पर निर्भर रहने के बजाय धीरे-धीरे अधिक संगठित पुलिस थानों, न्यायालयों और प्रशासनिक अधिकारियों की व्यवस्था विकसित हुई।
दीवानी और आपराधिक मामलों को औपचारिक न्यायिक प्रक्रियाओं के माध्यम से संचालित करने की व्यवस्था मजबूत हुई।
ये परिवर्तन मैसूर राज्य के अधिक व्यवस्थित और आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था की ओर बढ़ने की प्रक्रिया का हिस्सा थे।
1881 में सत्ता का हस्तांतरण
चित्रदुर्ग के प्रशासनिक इतिहास में 1881 एक महत्वपूर्ण मोड़ था।
‘मैसूर रेंडिशन’ के नाम से प्रसिद्ध सत्ता हस्तांतरण के तहत मैसूर में प्रत्यक्ष ब्रिटिश प्रशासन समाप्त हुआ और प्रशासनिक अधिकार महाराजा चामराजेंद्र वोडेयार दशम को वापस सौंप दिए गए।
इसके बाद चित्रदुर्ग वोडेयार शासित मैसूर रियासत का हिस्सा बना।
हालाँकि, मैसूर रियासत ब्रिटिश सर्वोच्चता के अधीन बनी रही। इसका अर्थ था कि महत्वपूर्ण राजनीतिक और बाहरी मामलों पर ब्रिटिश प्रभाव जारी रहा।
इसलिए 1881 से भारत की स्वतंत्रता तक चित्रदुर्ग पर ब्रिटिश भारत के किसी सामान्य प्रांत की तरह सीधे अंग्रेजों का शासन नहीं था। उसका प्रशासन मैसूर रियासत के एक भाग के रूप में किया जाता था।
मैसूर रियासत के अधीन प्रशासन
उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में मैसूर रियासत ने संगठित प्रशासन और सार्वजनिक विकास कार्यों को अधिक महत्व दिया।
इसका प्रभाव चित्रदुर्ग पर भी पड़ा। राजस्व, शिक्षा, कृषि, सार्वजनिक निर्माण, स्वास्थ्य, सिंचाई और स्थानीय प्रशासन से संबंधित सरकारी विभागों का धीरे-धीरे विस्तार हुआ।
नगरों में नगरपालिका और स्थानीय प्रशासनिक संस्थाओं का विकास होने लगा, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में जिला और तालुक स्तर के अधिकारी सरकारी कार्यों का संचालन करते रहे।
राजस्व संग्रह और कानून-व्यवस्था के साथ-साथ शिक्षा, परिवहन, सिंचाई और सार्वजनिक स्वास्थ्य भी प्रशासन के महत्वपूर्ण क्षेत्रों के रूप में विकसित हुए।
राजनीतिक जागरूकता का विकास
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ तक प्रशासनिक सुधारों और शिक्षा के प्रसार से चित्रदुर्ग में राजनीतिक जागरूकता बढ़ने लगी।
लोगों ने शासन में अधिक भागीदारी और जनप्रतिनिधित्व की माँग शुरू की। राष्ट्रवादी और गांधीवादी विचार जिले तक पहुँचे और राजनीतिक आंदोलनों को बल मिला।
नेताओं, विद्यार्थियों, महिलाओं और ग्रामीण जनता ने इन आंदोलनों में भाग लिया।
इसी राजनीतिक वातावरण से एस. निजलिंगप्पा जैसे नेता उभरे, जिन्होंने मैसूर रियासत में उत्तरदायी शासन की माँग से जुड़े आंदोलनों के साथ-साथ भारत के व्यापक स्वतंत्रता संग्राम में भी भाग लिया।
ब्रिटिश युग का अंत
जब 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ, तब रियासतों पर ब्रिटिश सर्वोच्चता समाप्त हो गई। मैसूर भारतीय संघ में शामिल हुआ और चित्रदुर्ग ने स्वतंत्र भारत की प्रशासनिक व्यवस्था के एक नए चरण में प्रवेश किया।
ब्रिटिश काल ने चित्रदुर्ग की प्रशासनिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए। पुराने शासकों से प्राप्त परंपरागत प्रशासनिक प्रणालियाँ धीरे-धीरे जिला प्रशासन, तालुक व्यवस्था, राजस्व अभिलेख, न्यायालय, पुलिस व्यवस्था, सार्वजनिक निर्माण और विशेष सरकारी विभागों पर आधारित अधिक संगठित प्रशासनिक ढाँचे में परिवर्तित हुईं।
इस प्रकार यह काल चित्रदुर्ग के इतिहास में एक महत्वपूर्ण संक्रमण का दौर था — नायक और मैसूर शासकों की पारंपरिक प्रशासनिक व्यवस्था से आधुनिक प्रशासन की ओर परिवर्तन, जिसने आगे चलकर स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक कर्नाटक की प्रशासनिक व्यवस्था के विकास की आधारभूमि तैयार की।
