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श्री बिच्चुगत्ति भरमन्ना नायक - चित्रदुर्ग के “समर मार्तंड”

चित्रदुर्ग के नायक शासकों में बिच्चुगत्ति भरमन्ना नायक का नाम अत्यंत गौरव के साथ लिया जाता है। वे केवल युद्धभूमि के वीर नहीं थे, बल्कि कुशल प्रशासक, दुर्ग निर्माता, जल-संसाधनों के विकासकर्ता और प्रजा की सुरक्षा को महत्व देने वाले शासक भी थे।

लेखक राघवेंद्र पद्मशालीप्रकाशित 20 अक्टूबर 20265 मिनट का पाठ1 बार देखा गया
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श्री बिच्चुगत्ति भरमन्ना नायक - चित्रदुर्ग के “समर मार्तंड”

चित्रदुर्ग के “समर मार्तंड” – वीरता, शासन और विकास के प्रतीक

चित्रदुर्ग के नायक शासकों में बिच्चुगत्ति भरमन्ना नायक का नाम अत्यंत गौरव के साथ लिया जाता है। वे केवल युद्धभूमि के वीर नहीं थे, बल्कि कुशल प्रशासक, दुर्ग निर्माता, जल-संसाधनों के विकासकर्ता और प्रजा की सुरक्षा को महत्व देने वाले शासक भी थे।

उनका शासनकाल मुख्यतः 1689 से 1721 के बीच माना जाता है।

इस अवधि में उन्होंने अनेक सैन्य चुनौतियों का सामना करते हुए चित्रदुर्ग की शक्ति को बढ़ाया और जनकल्याण के लिए अनेक निर्माण कार्य करवाए।

उनकी असाधारण युद्ध क्षमता के कारण उन्हें “समर मार्तंड” के रूप में स्मरण किया जाता है।

राजनीतिक संकट और मुद्दन्ना का प्रभाव

भरमन्ना नायक के उदय से पहले चित्रदुर्ग राजनीतिक संकट से गुजर रहा था।

लिंगन्ना नायक की हत्या के बाद दलवायी मुद्दन्ना अत्यंत शक्तिशाली हो गया।

परंपरागत विवरण के अनुसार, सूर्यकांतिरंगप्पा नायक को नाममात्र का शासक बनाकर मुद्दन्ना स्वयं पर्दे के पीछे से सत्ता पर नियंत्रण रखता था।

ऐसी परिस्थिति में भरमन्ना नायक एक निर्णायक शक्ति के रूप में सामने आए।

मुद्दन्ना के विरुद्ध संघर्ष और उसके प्रभुत्व से चित्रदुर्ग को मुक्त कराना भरमन्ना की वीरगाथा का एक महत्वपूर्ण अध्याय बना।

मुद्दन्ना का अंत

मुद्दन्ना साहसी होने के साथ-साथ राजनीतिक षड्यंत्रों और कठोर सत्ता-संघर्ष के लिए भी याद किया जाता है।

उसके विरुद्ध भरमन्ना का संघर्ष केवल दो व्यक्तियों का टकराव नहीं था। यह चित्रदुर्ग की सत्ता और भविष्य के लिए संघर्ष था।

मुद्दन्ना के अंत के साथ चित्रदुर्ग की राजनीति में एक नया अध्याय आरंभ हुआ और भरमन्ना नायक की शक्ति स्थापित हुई।

शांतवीर मुरुघेष से भेंट

भरमन्ना नायक के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं में शांतवीर मुरुघेष से उनकी भेंट भी उल्लेखनीय है।

यह प्रसंग उनके व्यक्तित्व के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पक्ष की ओर संकेत करता है।

वे केवल तलवार चलाने वाले योद्धा नहीं थे। अपने समय की धार्मिक और सांस्कृतिक संस्थाओं से भी उनका संबंध था।

दोड्डेरी का युद्ध

दोड्डेरी का युद्ध भरमन्ना नायक के सैन्य जीवन का एक महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है।

उस युग में छोटे-बड़े राज्यों को पड़ोसी शक्तियों के आक्रमणों का लगातार सामना करना पड़ता था।

भरमन्ना ने ऐसी परिस्थितियों में अपनी सैन्य क्षमता और नेतृत्व का परिचय दिया और चित्रदुर्ग की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।

दिलावर खान पर विजय

भरमन्ना नायक के जीवन का एक अन्य प्रसिद्ध प्रसंग दिलावर खान के विरुद्ध युद्ध और विजय है।

इस विजय ने उनकी युद्धवीर की प्रतिष्ठा को और मजबूत किया।

किसी दुर्ग की रक्षा केवल राजसिंहासन की रक्षा नहीं होती। उसके साथ प्रजा, खेती, जलस्रोत, व्यापार और पूरे क्षेत्र की सुरक्षा जुड़ी होती है।

भरमन्ना ने इस जिम्मेदारी को साहसपूर्वक निभाया।

अनेक शक्तियों का सामना

उनके शासनकाल में चित्रदुर्ग को तरीकेरे, बिदनूर, सावनूर के नवाब और मराठा सरदारों जैसी विभिन्न शक्तियों से चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

लेकिन भरमन्ना नायक ने इन चुनौतियों के बीच अपने राज्य की रक्षा व्यवस्था को मजबूत रखा।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे समझते थे कि राज्य केवल तलवार से नहीं, विकास से भी सुरक्षित होता है।

दुर्ग निर्माण

भरमन्ना नायक ने सुरक्षा के लिए अनेक दुर्गों को महत्व दिया।

उनसे संबंधित प्रमुख दुर्गों में अनाजी, आलूर, अलगट्टा, सिद्धव्वन दुर्ग और बसवन कोटे शामिल हैं।

इन दुर्गों ने चित्रदुर्ग की क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

चित्रदुर्ग के विशाल द्वार

चित्रदुर्ग दुर्ग के कुछ महत्वपूर्ण पत्थर के द्वार भी उनके काल के निर्माण कार्यों से जोड़े जाते हैं।

इनमें हनुमंतन बागिलु, हिडिंबेश्वरन बागिलु और एकनाथम्मन बागिलु विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

ये द्वार केवल प्रवेश मार्ग नहीं थे; वे दुर्ग की योजनाबद्ध सुरक्षा प्रणाली के महत्वपूर्ण अंग थे।

जल-संरक्षण और सिंचाई

चित्रदुर्ग जैसे अपेक्षाकृत शुष्क क्षेत्र में पानी का महत्व भरमन्ना नायक अच्छी तरह समझते थे।

उनके विकास कार्यों से भरमसागर, भीम समुद्र और जंपन्ना नायकन कोटे केरे जैसे जलस्रोत जुड़े हुए हैं।

तालाबों, कुओं और जलाशयों ने पीने के पानी के साथ कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी सहारा दिया।

इस प्रकार भरमन्ना का विकास केवल तत्कालीन जरूरतों तक सीमित नहीं था; उसका लाभ आने वाली पीढ़ियों को भी मिला।

नई बस्तियों की स्थापना

उनके शासन में भरमसागर, भरमनहल्ली और चिक्का सिद्धव्वनहल्ली जैसी बस्तियों के विकास को भी प्रोत्साहन मिला।

नई बस्तियाँ बसाना कृषि, व्यापार, प्रशासन और जनसंख्या के विस्तार से जुड़ा महत्वपूर्ण कदम था।

इससे स्पष्ट होता है कि भरमन्ना नायक केवल युद्धवीर नहीं बल्कि राज्य निर्माता भी थे।

मंदिर और सांस्कृतिक निर्माण

उनके काल से नीलकंठेश्वर, भीमेश्वर, चंद्रमौलेश्वर और हनुमंत मंदिरों जैसी धार्मिक संरचनाएँ जुड़ी हुई हैं।

इसी प्रकार मुरुगि मठ, भरमव्वन अरमने, गाली मंडप और बोक्कस जैसे निर्माण उनके काल की प्रशासनिक और सांस्कृतिक गतिविधियों की याद दिलाते हैं।

श्रृंगार तोटा और मल्लप्पन बावी का मंडप उस युग की सौंदर्य दृष्टि को भी दर्शाते हैं।

तलवार और विकास का संगम

भरमन्ना नायक की विशेषता उनके व्यक्तित्व के इसी संतुलन में दिखाई देती है।

शत्रु सामने आया तो वे योद्धा थे।

प्रजा को पानी चाहिए था तो वे जलाशय बनाने वाले शासक थे।

राज्य की सुरक्षा के लिए वे दुर्ग निर्माता थे।

धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन के लिए उन्होंने मंदिरों और संस्थाओं को संरक्षण दिया।

यही कारण है कि उनकी विरासत केवल युद्धों में नहीं बल्कि चित्रदुर्ग की धरती पर बने निर्माणों में भी दिखाई देती है।

साहित्य में भरमन्ना नायक

चित्रदुर्ग के नायक शासकों के इतिहास को कन्नड़ साहित्य में लोकप्रिय बनाने में त. रा. सु. का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

मुद्दन्ना की राजनीतिक चालें, दुर्ग के भीतर सत्ता संघर्ष, भरमन्ना का उदय और युद्धों से भरा वह समय ऐतिहासिक साहित्य के लिए अत्यंत प्रभावशाली विषय बना।

इन साहित्यिक प्रस्तुतियों ने भरमन्ना नायक की कहानी को नई पीढ़ियों तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

20 मई 1721 – एक युग का अंत

20 मई 1721 को बिच्चुगत्ति भरमन्ना नायक का निधन हुआ।

लेकिन उनका नाम उनके साथ समाप्त नहीं हुआ।

वह दुर्ग की दीवारों में जीवित है।

तालाबों के पानी में जीवित है।

उनके समय में विकसित बस्तियों में जीवित है।

मंदिरों की घंटियों में उसकी स्मृति गूँजती है।

और सबसे बढ़कर, वह चित्रदुर्ग की जनता की ऐतिहासिक स्मृति में जीवित है।

उनकी तलवार ने भूमि की रक्षा की, उनके दुर्गों ने लोगों को सुरक्षा दी, उनके जलाशयों ने खेतों को जीवन दिया और उनके विकास कार्यों ने राज्य को मजबूत बनाया।

इसीलिए “समर मार्तंड बिच्चुगत्ति भरमन्ना नायक” का नाम चित्रदुर्ग के इतिहास में सदैव वीरता, स्वाभिमान और विकास के प्रतीक के रूप में स्मरण किया जाएगा।

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लेखक के बारे में

राघवेंद्र पद्मशाली · प्रशासक / मुख्य संपादक

चितारदुर्गा के संस्थापक, एडमिन और मुख्य संपादक संपर्क: +91 77979 73031, +91 97432 08738 वेबसाइट: www.raghavendrapadmashali.com

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