ऐतिहासिक रूप से वीरता, त्याग और प्रतिरोध की भूमि के रूप में प्रसिद्ध चित्रदुर्ग ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कभी नायक शासकों के पराक्रम और ओनके ओबव्वा जैसी वीरांगनाओं के साहस का साक्षी रहा यह क्षेत्र बीसवीं शताब्दी में गांधीवादी आंदोलन, सत्याग्रह, सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय जागरण का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।
चित्रदुर्ग को वीरता, त्याग और प्रतिरोध की भूमि के रूप में जाना जाता है। भारत के आधुनिक स्वतंत्रता संग्राम से कई शताब्दियों पहले ही यह क्षेत्र नायक शासकों के पराक्रम और ओनके ओबव्वा जैसी वीरांगनाओं के असाधारण साहस का साक्षी रहा था। बीसवीं शताब्दी में प्रतिरोध की यही परंपरा एक नए रूप में सामने आई, जब चित्रदुर्ग के अनेक लोगों ने ब्रिटिश शासन और औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया।
भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान चित्रदुर्ग जिले में गांधीवादी आंदोलन ने महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया। महात्मा गांधी के सत्याग्रह, अहिंसा, स्वदेशी, खादी, मद्यनिषेध, सामाजिक समानता, सादा जीवन और ग्रामोद्धार जैसे सिद्धांतों ने इस क्षेत्र के राजनीतिक कार्यकर्ताओं, शिक्षकों, विद्यार्थियों, महिलाओं और ग्रामीण जनता पर गहरा प्रभाव डाला।
1942 का भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे निर्णायक चरणों में से एक था। उस समय मैसूर रियासत का हिस्सा रहे चित्रदुर्ग जिले पर भी इस आंदोलन का उल्लेखनीय प्रभाव पड़ा। राष्ट्रीय स्वतंत्रता का संदेश जिले के नगरों और ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुँचा तथा लोगों में स्वराज और स्वतंत्रता के प्रति राजनीतिक जागरूकता को और मजबूत किया।
15 अगस्त 1947 को जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब ऐतिहासिक चित्रदुर्ग क्षेत्र भी एक महत्वपूर्ण परिवर्तन के दौर से गुजर रहा था। अपने भव्य किले, नायक शासकों, वीर परंपरा और संघर्षपूर्ण इतिहास के लिए प्रसिद्ध चित्रदुर्ग सदियों के राजनीतिक परिवर्तनों के बाद स्वतंत्र भारत के नए लोकतांत्रिक युग में प्रवेश कर रहा था।