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श्री हुल्लूरु श्रीनिवास जोइस - इतिहासकार, शोधकर्ता, राष्ट्रप्रेमी और समर्पित कार्यकर्ता

चित्रदुर्ग की ऐतिहासिक विरासत को सुरक्षित रखने वाले महान विद्वानों में श्री हुल्लूरु श्रीनिवास जोइस का विशिष्ट स्थान है। वे इतिहासकार, शोधकर्ता, अधिवक्ता, लेखक, पत्रकार और राष्ट्रप्रेमी थे। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और कर्नाटक एकीकरण आंदोलन में भी सक्रिय भाग लिया।

लेखक राघवेंद्र पद्मशालीप्रकाशित 20 अक्टूबर 20265 मिनट का पाठ1 बार देखा गया
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श्री हुल्लूरु श्रीनिवास जोइस - इतिहासकार, शोधकर्ता, राष्ट्रप्रेमी और समर्पित कार्यकर्ता

श्री हुल्लूरु श्रीनिवास जोइस

इतिहासकार, शोधकर्ता, राष्ट्रप्रेमी और कर्नाटक एकीकरण के समर्पित कार्यकर्ता

चित्रदुर्ग की ऐतिहासिक विरासत को सुरक्षित रखने वाले महान विद्वानों में श्री हुल्लूरु श्रीनिवास जोइस का विशिष्ट स्थान है।

वे इतिहासकार, शोधकर्ता, अधिवक्ता, लेखक, पत्रकार और राष्ट्रप्रेमी थे। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और कर्नाटक एकीकरण आंदोलन में भी सक्रिय भाग लिया।

अपने शोध और लेखन के माध्यम से उन्होंने चित्रदुर्ग तथा कर्नाटक के इतिहास को कन्नड़ समाज के सामने लाने का महत्वपूर्ण कार्य किया।

जन्म और परिवार

श्रीनिवास जोइस का जन्म 29 मार्च 1892 को हुआ।

लगभग तीन सौ वर्ष पहले उनके पूर्वज बल्लारी जिले के कोट्टूर के निकट स्थित अंबले गाँव से चित्रदुर्ग जिले के हुल्लूरु आकर बसे थे।

उनके पिता का नाम पांडुरंग जोइस और माता का नाम पार्वतम्मा था।

उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा चित्रदुर्ग में प्राप्त की। मैट्रिक उत्तीर्ण करने के बाद कुछ समय नौकरी की। बाद में उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी, कानून की डिग्री प्राप्त की और वकालत शुरू की।

पेशे से वकील, रुचि से इतिहासकार

वकालत उनका पेशा था, लेकिन अध्ययन और इतिहास अनुसंधान उनका विशेष जुनून था।

उन्होंने ऐतिहासिक स्थलों, व्यक्तियों, घटनाओं और अभिलेखों का गहन अध्ययन किया और कर्नाटक के इतिहास के विशेषज्ञ के रूप में अपनी पहचान बनाई।

उनके लिए इतिहास केवल राजाओं और युद्धों का विवरण नहीं था। वे इतिहास के माध्यम से भाषा, धर्म, संस्कृति, वीरता, सात्विकता, आदर्श और उदारता जैसे मूल्यों को सामने लाना चाहते थे।

25 वर्षों में 300 से अधिक लेख

लगभग पच्चीस वर्षों तक श्रीनिवास जोइस ने ऐतिहासिक शोध और लेखन का कार्य किया।

इस दौरान उन्होंने तीन सौ से अधिक लेख लिखे।

उनके लेखों में ऐतिहासिक स्थल, महत्वपूर्ण व्यक्तित्व, घटनाएँ, भाषा, धर्म और संस्कृति जैसे अनेक विषय शामिल थे।

इन लेखों के माध्यम से उन्होंने कन्नड़ समाज को अपनी ऐतिहासिक विरासत के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया।

चित्रदुर्ग और कर्नाटक के इतिहासकार

चित्रदुर्ग का इतिहास उनके शोध का महत्वपूर्ण विषय था।

उन्होंने चित्रदुर्ग के लंबे ऐतिहासिक अतीत से जुड़े तथ्यों, स्थानों और घटनाओं का अध्ययन किया। साथ ही उन्होंने पूरे कर्नाटक के इतिहास पर भी बड़ी संख्या में लेख लिखे।

इस प्रकार उनका योगदान केवल स्थानीय इतिहास तक सीमित नहीं रहा; उन्होंने कर्नाटक के व्यापक ऐतिहासिक अध्ययन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

दस पुस्तकें और महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कृतियाँ

श्रीनिवास जोइस ने दस पुस्तकों की रचना की।

उनकी प्रमुख कृतियों में ‘गंडुगलि कुमारराम’ तथा ‘कन्नड़ कलि सिरुमन चरिते’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

इसके अतिरिक्त उनके द्वारा संपादित और प्रकाशित ‘चित्रदुर्गद बखैरु’ एक अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज माना जाता है।

ऐसे स्रोतों को संकलित और प्रकाशित कर उन्होंने भविष्य के इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के लिए मूल्यवान सामग्री सुरक्षित की।

त. रा. सु. और जी. वरदराज राव का सम्मान

कन्नड़ साहित्य जगत में श्रीनिवास जोइस को प्राप्त सम्मान का एक विशेष उदाहरण मिलता है।

प्रसिद्ध कन्नड़ साहित्यकार त. रा. सु. ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘हंसगीते’ श्रीनिवास जोइस को समर्पित की।

इसी प्रकार जी. वरदराज राव ने ‘कुमाररामन सांगत्य’ उन्हें समर्पित किया।

ये समर्पण इतिहास और कन्नड़ संस्कृति के क्षेत्र में उनके प्रति विद्वानों के सम्मान को दर्शाते हैं।

स्वतंत्रता आंदोलन और कर्नाटक एकीकरण

श्रीनिवास जोइस केवल पुस्तकालयों में शोध करने वाले इतिहासकार नहीं थे। वे सक्रिय राष्ट्रप्रेमी भी थे।

उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया और कर्नाटक एकीकरण के लिए भी सक्रिय रूप से कार्य किया।

एकीकरण से पहले कन्नड़ भाषी क्षेत्र विभिन्न प्रशासनिक इकाइयों में बँटे हुए थे। इन क्षेत्रों को एक राज्य में लाने का आंदोलन कन्नड़ भाषा और सांस्कृतिक पहचान से गहराई से जुड़ा था।

श्रीनिवास जोइस के लिए इतिहास, भाषा और मातृभूमि के प्रति प्रेम एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।

पत्रकारिता में योगदान

उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किया।

वे समाचार-पत्र संवाददाता रहे और चित्रदुर्ग जिला पत्रकार संघ के अध्यक्ष के रूप में भी सेवा की।

इसके अतिरिक्त उन्होंने मैसूर राज्य पत्रकार संघ, मैसूर क्षेत्रीय ऐतिहासिक अभिलेख खोज समिति तथा विभिन्न योजना समितियों के सदस्य के रूप में महत्वपूर्ण सेवाएँ दीं।

चित्रदुर्ग पुरातत्व संग्रहालय

श्रीनिवास जोइस ने केवल इतिहास लिखा ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक वस्तुओं और प्रमाणों को सुरक्षित रखने का भी प्रयास किया।

उन्होंने चित्रदुर्ग में पुरातत्व संग्रहालय की स्थापना की और उसके मानद क्यूरेटर के रूप में सेवा की।

लगभग दो हजार वर्षों के इतिहास से जुड़े प्रमाणों और जानकारियों को दर्ज तथा सुरक्षित करने का उनका प्रयास अत्यंत महत्वपूर्ण था।

उपाधियाँ और सम्मान

उनके ऐतिहासिक अनुसंधान को मान्यता देते हुए उन्हें ‘इतिहास संशोधन प्रसक्त’ तथा ‘ऐतिह्य विमर्शन विचक्षण’ जैसी सम्मानजनक उपाधियाँ प्रदान की गईं।

ये सम्मान इतिहास के प्रति उनके गहन अध्ययन और समर्पण को दर्शाते हैं।

जीवन का अंतिम अध्याय

इतिहास, साहित्य, पत्रकारिता, वकालत, स्वतंत्रता आंदोलन, कर्नाटक एकीकरण और पुरातत्व संरक्षण के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले श्री हुल्लूरु श्रीनिवास जोइस का निधन 8 नवंबर 1956 को हुआ।

यह उल्लेखनीय है कि कर्नाटक एकीकरण का सपना साकार होने और 1 नवंबर 1956 को एकीकृत मैसूर राज्य के अस्तित्व में आने के केवल कुछ दिनों बाद उनका निधन हुआ।

इतिहास को जीवित रखने वाला साधक

हुल्लूरु श्रीनिवास जोइस ने केवल इतिहास का अध्ययन नहीं किया — उन्होंने उसे खोजा, दर्ज किया, प्रकाशित किया और सुरक्षित रखने का प्रयास किया।

लगभग पच्चीस वर्षों का अनुसंधान, तीन सौ से अधिक लेख, दस पुस्तकें, ऐतिहासिक दस्तावेजों का संपादन, पत्रकारिता, स्वतंत्रता आंदोलन, कर्नाटक एकीकरण और संग्रहालय की स्थापना उनके बहुआयामी जीवन के प्रमाण हैं।

लगभग दो हजार वर्षों के इतिहास के पदचिह्नों को खोजकर दर्ज करने वाले श्री हुल्लूरु श्रीनिवास जोइस चित्रदुर्ग और कर्नाटक की ऐतिहासिक-सांस्कृतिक स्मृति में सदैव सम्मानपूर्वक याद किए जाएंगे।

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लेखक के बारे में

राघवेंद्र पद्मशाली · प्रशासक / मुख्य संपादक

चितारदुर्गा के संस्थापक, एडमिन और मुख्य संपादक संपर्क: +91 77979 73031, +91 97432 08738 वेबसाइट: www.raghavendrapadmashali.com

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